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शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

मंगलवार, 23 मार्च 2010

कुमार अजय की बचपन को समर्पित तीन लघु कविताएं

(एक)

स्मृति-शेष

बचपन की
स्मृतियों में ही शायद
अपने भीतर
ढेर सारा बचपना
संजोये हुए हैं लोग ।
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(दो)

दोहराव

बचपन के
दिनों को
याद करते हुए
आज मैंने सोचा
कि खुद को
दोहराने वाला
इतिहास आखिर
हमें क्यों नहीं दोहराता ?
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(तीन)

भरपाई

बचपन
नहीं आयेगा
लौटकर
इस दुःख को
कम करने के लिए
क्या पर्याप्त नहीं है
यह सुख
कि हम भी
कभी बच्चे थे...।

रविवार, 24 जनवरी 2010

नवोदय/ पीयूष शर्मा ‘पारस’ की कविता

जमाने को लगी हवा जमाने की

फितरत बदल गई जमाने के साथ इस जमाने की
पहले थी कुछ और मगर अब है और बात जमाने की।

ना वो प्यार है ना मिठास है अब इस जमाने में
बस रह गई हैं सिर्फ और सिर्फ बातें उस जमाने की।

कुछ ऐसी चली हवा कि बदल गई सब रीतें
ना दुआ ना सलाम पैसे में बदली प्रीत जमाने की।

वक्त ने बदले हालात तो आई याद उस जमाने की
कि लग गई हो जैसे नजर उस जमाने को इस जमाने की।


(श्री पीयूष शर्मा पारस दैनिक भास्कर चूरू में बतौर रिपोर्टर कार्यरत हैं।)

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

नये साल की मुबारकबाद

बढ़ी हुई शेव के साथ
बिस्तर पर
औंधे मुंह पड़े हुए
बावजूद अनिच्छा के
नये साल में घुस रहा हूं,

ख्वाबों की खूबसूरती में
गुजरे हुए कल
और
अतीत की तरह सुनहरे
भविष्य की उम्मीदों को
किनारे करके
वर्तमान सवार है
मेरी पीठ पर
सच सी निर्ममता लिये।

दोस्तो !
तुम नहीं जानते शायद
कि तुम्हारी दुआएं
महज मजाक हैं
खुद को
और मुझे
बहलाने की कोशिश भर।

यदि नहीं तो फिर
सारे मिलकर
शोकग्रस्त हो जाओ
गुजरे हुए उस साल के लिए
जो कभी आया था यकीनन
नये साल की तरह
हम सभी की जिंदगी में ।

- कुमार अजय



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

बिना क्षितिज के आसमान हो गए...


कुमार अजय की एक ग़ज़ल

सुविधाओं के ही घमासान हो गए
वेतन बढे, छोटे मकान हो गए।

दूर अपनों से इस कदर हुए
बिना क्षितिज के आसमान हो गए।

जिंदगी और मौत भी प्यारी लगीं
प्यार में दोहरे रूझान हो गए।

उल्फत में निकले लब्ज जाने कब
रामधुन-कीरतन-अजान हो गए।

मुश्किलें इस कदर पड़ी मुझ पर
जिंदगी के मसले आसान हो गए।

जिनमें सबकी अपनी अपनी कब्रे हैं
नाजुक आशियाने ही श्मसान हो गए।
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मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

गुलज़ार की एक खूबसूरत कविता


मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
आह चुभता है ये अलग कर दो

मुझको इतने से काम पे रख लो....

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है

मुझको इतने से काम पे रख लो...

रविवार, 20 दिसंबर 2009

कुमार अजय की एक ताज़ा ग़ज़ल

उसने मुझ पर उछाले पत्थर...

उसने मुझ पर उछाले पत्थर
मैंने बुनियाद में डाले पत्थर।

तेरी राह में हर मील पे गड़ा हूं
तेरी औकात है तो हिला ले पत्थर।

मेरी तो आदत है सच कहूंगा ही
तू हाथों में लाख उठा ले पत्थर।

हर पत्थर सजदे में झुका है
उसने कुछ ऐसे हैं ढाले पत्थर।

बुरे दौर में रोटी की बात न कर
तलब है तो पी ले पत्थर, खा ले पत्थर।

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