डायरी/कुमार अजय
डायरी/कुमार अजय
*देह के दर्द में भी मन के पीड़क याद आते हैं...*
शरीर की पीड़ा को भोगते हुए समझ आता है कि मन की पीड़ा को ज्यादा ही महिमा मंडित किया गया है। वास्तविक पीड़ा तो यही है जो देह भुगत रही है। यह और बात है कि देह के दर्द में भी, मन के पीड़क याद आते हैं। याद आते हैं और आदमी सोचता है कि काश वे आएं और सारे जख्म भर दें। जिन्होंने मन को छीलने में कभी कोताही नहीं बरती, वे शरीर के जख्म तो क्या ही ठीक कर जाएंगे लेकिन खुशी हो या गम, याद आते हैं वे मित्र-यम।
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एक लंबी फेहरिश्त है उन प्रतिभाओं की, जिन्हें नशा लील गया। फिर भी, कुछ प्रतिभाओं को गंदगी फैलाते देखकर लगता है कि इस सूची में ये कुुछ नाम और आ जाते तो ठीक था। यह बेहद हिंसक विचार है, जिसने संभवतः हिंसक शब्दों की प्रतिक्रिया में ही जन्म लिया है पर यह ठीक विचार नहीं है। आंख के बदले आंख का विचार तो दुनिया को अंधा बना ही देगा।
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मैं जब छोटा था तो भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद जैसे विषयों पर ऐसे ही सोचता था, जैसे अब अधिकांश लोग सोच रहे हैं। मुझे अपने और इन सबके बचपने पर बहुत तरस आता है। हम सभी जानते हैं कि सत्ता का अपना एक चरित्र रहता आया है और सत्ता को बनाए रखने के लिए लोग किसी भी हद तक जाते रहे हैं। हमारे पास एक रक्तरंजित इतिहास है, जिसमें कितने ही बादशाहों ने तख्त और ताज के लिए अपनों का ही खून बहाया। महान से महान राजाओं की तलवारें निर्दोषों के खून से रंगी पड़ी हैं।
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भारत एक महाशक्ति है और पाकिस्तान अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं वहां सत्तासीनों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। संकट से घिरे पाकिस्तानी नेताओं के लिए युद्ध के हालात संजीवनी बन गए हैं। मूल मसलों से जनता का ध्यान हटा दिया जाए तो कुर्सी पर बने रहना थोड़ा आसान तो हो ही जाता है।
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कुछ लोगों को किसी भी शर्त पर दूसरों की मदद करने की बीमारी होती है। किसी की भी पीड़ा पर वे भावुक हो जाते हैं और पीड़ा देह बदल लेती है। भावुक होना गलत बात नहीं है। यदि आदमी भावुक न हो तो उसका आदमी होना ही बेकार है और यदि वह भावुक है तो फिर बाकी सब मिलकर उसकी जिंदगी को बेकार कर देते हैं।
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जब हम खुद को लेकर संशयग्रस्त होते हैं तो हमारा हित सोचने वाले दूसरे लोगों को भी हमारे विषय में संशय हो जाता है। हमारे पक्ष में कुछ भी भला सोचने में उन्हें दिक्कत आती है। हालांकि संशय शत्रु है और हम में निर्णय लेने की क्षमता और इच्छा होनी ही चाहिए लेकिन कभी-कभी कुछ निर्णय भी बड़े शत्रु साबित होते हैं। (3 मई, 2025)

