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बुधवार, 7 मई 2025

*देह के दर्द में भी मन के पीड़क याद आते हैं

 डायरी/कुमार अजय


डायरी/कुमार अजय

*देह के दर्द में भी मन के पीड़क याद आते हैं...*


शरीर की पीड़ा को भोगते हुए समझ आता है कि मन की पीड़ा को ज्यादा ही महिमा मंडित किया गया है। वास्तविक पीड़ा तो यही है जो देह भुगत रही है। यह और बात है कि देह के दर्द में भी, मन के पीड़क याद आते हैं। याद आते हैं और आदमी सोचता है कि काश वे आएं और सारे जख्म भर दें। जिन्होंने मन को छीलने में कभी कोताही नहीं बरती, वे शरीर के जख्म तो क्या ही ठीक कर जाएंगे लेकिन खुशी हो या गम, याद आते हैं वे मित्र-यम।

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एक लंबी फेहरिश्त है उन प्रतिभाओं की, जिन्हें नशा लील गया। फिर भी, कुछ प्रतिभाओं को गंदगी फैलाते देखकर लगता है कि इस सूची में ये कुुछ नाम और आ जाते तो ठीक था। यह बेहद हिंसक विचार है, जिसने संभवतः हिंसक शब्दों की प्रतिक्रिया में ही जन्म लिया है पर यह ठीक विचार नहीं है। आंख के बदले आंख का विचार तो दुनिया को अंधा बना ही देगा।

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मैं जब छोटा था तो भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद जैसे विषयों पर ऐसे ही सोचता था, जैसे अब अधिकांश लोग सोच रहे हैं। मुझे अपने और इन सबके बचपने पर बहुत तरस आता है। हम सभी जानते हैं कि सत्ता का अपना एक चरित्र रहता आया है और सत्ता को बनाए रखने के लिए लोग किसी भी हद तक जाते रहे हैं। हमारे पास एक रक्तरंजित इतिहास है, जिसमें कितने ही बादशाहों ने तख्त और ताज के लिए अपनों का ही खून बहाया। महान से महान राजाओं की तलवारें निर्दोषों के खून से रंगी पड़ी हैं।

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भारत एक महाशक्ति है और पाकिस्तान अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं वहां सत्तासीनों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। संकट से घिरे पाकिस्तानी नेताओं के लिए युद्ध के हालात संजीवनी बन गए हैं। मूल मसलों से जनता का ध्यान हटा दिया जाए तो कुर्सी पर बने रहना थोड़ा आसान तो हो ही जाता है।

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कुछ लोगों को किसी भी शर्त पर दूसरों की मदद करने की बीमारी होती है। किसी की भी पीड़ा पर वे भावुक हो जाते हैं और पीड़ा देह बदल लेती है। भावुक होना गलत बात नहीं है। यदि आदमी भावुक न हो तो उसका आदमी होना ही बेकार है और यदि वह भावुक है तो फिर बाकी सब मिलकर उसकी जिंदगी को बेकार कर देते हैं।  

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जब हम खुद को लेकर संशयग्रस्त होते हैं तो हमारा हित सोचने वाले दूसरे लोगों को भी हमारे विषय में संशय हो जाता है। हमारे पक्ष में कुछ भी भला सोचने में उन्हें दिक्कत आती है। हालांकि संशय शत्रु है और हम में निर्णय लेने की क्षमता और इच्छा होनी ही चाहिए लेकिन कभी-कभी कुछ निर्णय भी बड़े शत्रु साबित होते हैं। (3 मई, 2025)

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014


चूरू के कुमार अजय जोधपुर में होंगे युवा पुरस्कार से सम्मानित
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से 5 फरवरी को होगा समारोह, 50 हजार रुपए एवं ताम्रफलक प्रदान करेंगे अकादेमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
चूरू, 3 फरवरी। राजस्थानी के चर्चित युवा साहित्यकार कुमार अजय को जोधपुर में पांच फरवरी को भारत सरकार की साहित्य अकादेमी की ओर से होने वाले समारोह में युवा पुरस्कार दिया जाएगा। राजस्थानी कविता संग्रह ‘संजीवणी’ के लिए घोषित इस पुरस्कार के अंतर्गत 50 हजार रुपए का चैक व ताम्रफलक दिया जाएगा।
अकादेमी सचिव के श्रीनिवास राव के मुताबिक नामवर कवि नंदकिशोर आचार्य की मौजूदगी में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी राजस्थानी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए युवा साहित्यकारों को पुरस्कार देंगे। कुमार अजय के अलावा हिंदी के लिए अर्चना भैसारे, पंजाबी के लिए हरप्रीत कौर, संस्कृत में राजकुमार मिश्र, उर्दू में मोइद रसीदी, बांग्ला में शुभ्र बंदोपाध्याय, अंग्रेजी में जैनिस पैरियाट, गुजराती में अशोक चवड़ा समेत 22 भारतीय भाषाओं के लिए यह पुरस्कार दिए जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि ‘संजीवणी’ कविता संग्रह पर इससे पूर्व श्रीमती बसंती देवी धानुका युवा पुरस्कार भी दिया जा चुका है। चूरू जिले के गांव घांघू में 24 जुलाई 1982 को जन्मे कुमार अजय राजस्थानी व हिंदी में समान रूप से सक्रिय हैं तथा  कविता, कहानी, लघुकथा, गजल विधाओं में लिखते हैं। राजस्थानी (एम.ए.) में महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के गोल्ड मेडलिस्ट अजय की कविता पुस्तक ‘संजीवणी’ के अलावा राजस्थानी में कहानी पुस्तक ‘किणी रै कीं नीं हुयौ’ तथा पिछले वर्ष प्रकाशित हिंदी कविता संग्रह ‘ कहना ही है तो कहो’ भी खासे चर्चा में रहे हैं। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के लिए सलाम बिन रजाक के उर्दू कहानी संग्रह ‘शिकस्ता बुतों के दरमियान’ का अनुवाद कर चुके अजय इन दिनों कन्नड़ के प्रख्यात लेखक कुवेम्पु के  उपन्यास ‘कानूरु हेग्गडिति’ के राजस्थानी अनुवाद में जुटे हैं।
चूरू में बतौर सहायक जनसंपर्क अधिकारी कार्यरत कुमार अजय को पूर्व में पत्रकारिता के दौरान वर्ष 2006 में राज्य स्तरीय ग्राम गदर पुरस्कार, वर्ष 2007 में कुलिश स्मृतिः कलम से स्वराज पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
इससे पूर्व वर्ष 2011 में जिले के साहित्यकार दुलाराम सहारण तथा वर्ष 2013 में कोटा के ओम नागर को राजस्थानी भाषा के लिए साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

मंगलवार, 23 मार्च 2010

कुमार अजय की बचपन को समर्पित तीन लघु कविताएं

(एक)

स्मृति-शेष

बचपन की
स्मृतियों में ही शायद
अपने भीतर
ढेर सारा बचपना
संजोये हुए हैं लोग ।
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(दो)

दोहराव

बचपन के
दिनों को
याद करते हुए
आज मैंने सोचा
कि खुद को
दोहराने वाला
इतिहास आखिर
हमें क्यों नहीं दोहराता ?
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(तीन)

भरपाई

बचपन
नहीं आयेगा
लौटकर
इस दुःख को
कम करने के लिए
क्या पर्याप्त नहीं है
यह सुख
कि हम भी
कभी बच्चे थे...।

रविवार, 24 जनवरी 2010

नवोदय/ पीयूष शर्मा ‘पारस’ की कविता

जमाने को लगी हवा जमाने की

फितरत बदल गई जमाने के साथ इस जमाने की
पहले थी कुछ और मगर अब है और बात जमाने की।

ना वो प्यार है ना मिठास है अब इस जमाने में
बस रह गई हैं सिर्फ और सिर्फ बातें उस जमाने की।

कुछ ऐसी चली हवा कि बदल गई सब रीतें
ना दुआ ना सलाम पैसे में बदली प्रीत जमाने की।

वक्त ने बदले हालात तो आई याद उस जमाने की
कि लग गई हो जैसे नजर उस जमाने को इस जमाने की।


(श्री पीयूष शर्मा पारस दैनिक भास्कर चूरू में बतौर रिपोर्टर कार्यरत हैं।)

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

नये साल की मुबारकबाद

बढ़ी हुई शेव के साथ
बिस्तर पर
औंधे मुंह पड़े हुए
बावजूद अनिच्छा के
नये साल में घुस रहा हूं,

ख्वाबों की खूबसूरती में
गुजरे हुए कल
और
अतीत की तरह सुनहरे
भविष्य की उम्मीदों को
किनारे करके
वर्तमान सवार है
मेरी पीठ पर
सच सी निर्ममता लिये।

दोस्तो !
तुम नहीं जानते शायद
कि तुम्हारी दुआएं
महज मजाक हैं
खुद को
और मुझे
बहलाने की कोशिश भर।

यदि नहीं तो फिर
सारे मिलकर
शोकग्रस्त हो जाओ
गुजरे हुए उस साल के लिए
जो कभी आया था यकीनन
नये साल की तरह
हम सभी की जिंदगी में ।

- कुमार अजय



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

बिना क्षितिज के आसमान हो गए...


कुमार अजय की एक ग़ज़ल

सुविधाओं के ही घमासान हो गए
वेतन बढे, छोटे मकान हो गए।

दूर अपनों से इस कदर हुए
बिना क्षितिज के आसमान हो गए।

जिंदगी और मौत भी प्यारी लगीं
प्यार में दोहरे रूझान हो गए।

उल्फत में निकले लब्ज जाने कब
रामधुन-कीरतन-अजान हो गए।

मुश्किलें इस कदर पड़ी मुझ पर
जिंदगी के मसले आसान हो गए।

जिनमें सबकी अपनी अपनी कब्रे हैं
नाजुक आशियाने ही श्मसान हो गए।
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मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

गुलज़ार की एक खूबसूरत कविता


मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
आह चुभता है ये अलग कर दो

मुझको इतने से काम पे रख लो....

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है

मुझको इतने से काम पे रख लो...

रविवार, 20 दिसंबर 2009

कुमार अजय की एक ताज़ा ग़ज़ल

उसने मुझ पर उछाले पत्थर...

उसने मुझ पर उछाले पत्थर
मैंने बुनियाद में डाले पत्थर।

तेरी राह में हर मील पे गड़ा हूं
तेरी औकात है तो हिला ले पत्थर।

मेरी तो आदत है सच कहूंगा ही
तू हाथों में लाख उठा ले पत्थर।

हर पत्थर सजदे में झुका है
उसने कुछ ऐसे हैं ढाले पत्थर।

बुरे दौर में रोटी की बात न कर
तलब है तो पी ले पत्थर, खा ले पत्थर।

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कौशल दाधीच की ग़ज़ल



नहीं लिखता ...


उनको ये शिकायत है मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.

'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ?
मैं इसलिए औरों की बुराई पे नही लिखता.

कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.

दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात कि मैं कुछ अपनी सफ़ाई पे नही लिखता.'

शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़ मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की कमाई पे नही लिखता.

उसकी ताक़त का नशा "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.

समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी गहराई पे नही लिखता.

'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.

'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का' ना लिखने की वजह बस ये!!
'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता ।

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

नवोदय/ सुनील शर्मा की कविता


जिसे सोचता हूं खूब...

चाहत इस दिल की मुकम्मल हो न हो
जिंदगी में उसे पाने का मकसद जरूर है।

पंख कटे तो क्या, उड़ने की चाहत तो है
सपनों पर बंदिश तो दुनिया का दस्तूर है।

नाव डगमग डोलती पर नाखुदा है हिम्मती
और तूफानों से लड़ने का जज्बा भरपूर है।

झोंक कर खुद को आग में मिटता है पतंग
उल्फत की इन रस्मों में किसका कसूर है ।

इक चाहत मे बेबस ये भी कोई जीवन है
नाजुक सी एक चोट से हर अरमां चूर है।

जिसे सोचता हूं खूब, उसे चाहता हू खूब
होगा तो वही ‘सुनील’ जो खुदा को मंजूर है।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

तसलीमा नसरीन की कविताएँ


पिता, पति, पुत्र

अगर तुम्हारा जन्म नारी के रूप मे हुआ है तो

बचपन में तुम पर

शासन करेंगे पिता

अगर तुम अपना बचपन बिता चुकी हो

नारी के रूप में

तो जवानी में तुम पर

राज करेगा पति

अगर जवानी की दहलीज़

पार कर चुकी होगी

तो बुढ़ापे में

रहोगी पुत्र के अधीन

जीवन-भर तुम पर

राज कर रहे हैं ये पुरुष

अब तुम बनो मनुष्य

क्योंकि वह किसी की नहीं मानता अधीनता -

वह अपने जन्म से ही

करता है अर्जित स्वाधीनता


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तोप दागना

मेरे घर के सामने स्पेशल ब्रांच के लोग

चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं

कौन आता है कौन जाता है

कब निकलती हूँ, कब वापस आती हूँ

सब कापी में लिखकर रखते हैं

किसके साथ दोस्ती है

किसकी कमर से लिपटकर हँसती हूँ

किसके साथ फुसफुसाकर बातें करती हूँ ...सब कुछ

लेकिन एक चीज़ जिस वे दर्ज़ नहीं कर पाते

वह है - मेरे दिमाग़ में कौन-सी भावनाएँ

उमड़-घुमड़ रही है

मैं अपनी चेतना मे क्या कुछ सँजो रही हूँ

सरकार के पास तोप और कमान हैं

और मुझ जैसी मामूली मच्छर के पास है डंक

शनिवार, 21 नवंबर 2009

हसरत जयपुरी की एक ग़ज़ल


इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिये
रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये

छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी
जब भी आयें पी के जाया कीजिये

ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा
इन शराबों में नहाया कीजिये

ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी
अपने हाथों से पिलाया कीजिये

शनिवार, 14 नवंबर 2009

कुमार अजय की गजलें


एक लब्ज न बोलूंगा...


तिरे पहलू में बैठकर जी भर के रो लूंगा
नाराजगी भी निभाऊंगा, एक लब्ज न बोलूंगा।


तुम्हारी मुहब्बत में दर्द के दरिया से कभी
निजात हो भी गई तो फिर से दिल डुबो लूंगा।


तुझे मुझसे डर है, मुझे तुम्हारी फिकर है
आखिर मैं क्यूं जहर तेरी जिंदगी में घोलूंगा।


इस घने जंगल में आदमी से डरता हूं मैं
कोई जानवर मिले तो तय है साथ हो लूंगा।


मेरी जेब में हादसों के हसीन मोती भरे हैं
वक्त मिला तो उन्हें आंसू के धागे में पिरो लूंगा।


बाहर दम घुटे है, एक कब्र बख्श दे मौला
तेरे बंदों से नजर बचाके चैन से तो सो लूंगा।

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राहतों का मौसम है...

एक मुट्ठी धूप की और एक मुट्ठी छांव की
राहतों का मौसम है ये मिट्टी मेरे गांव की।

जूते को सिर पर रखो तो मरजी आपकी
वरना तो ये जरूरत है महज पांव की।

कोयल पर जान देना तो रिवाज है यहां का
कभी कशिश तौल तू किसी कांव-कांव की।

बांहें फैला बेशक, आकाश को थाम भी ले
पर देख खिसक न जाए जमीन पांव की।

जिंदगी की बिसात पर नये मोहरे खरीद
अब तो दुकानें खुल गईं हर पेंच-दांव की।
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खामोशी के मतलब हजार हैं...


चोट खाईये और मुस्काराईये
दर्द की हदों को भी आजमाईये।

दोस्तों के खंजर सह लीजिये
दुश्मनों से दोस्ती मगर निभाईये।

आपकी खामोशी के मतलब हजार हैं
लब खोलिये, ना मुझको उलझााईये।

बाद सदियों के चाहा है किसी को
हमारी ये जुर्रत ना यूं ठुकराईये।

रिश्तों में दलाली मुनासिब तो नहीं
नजदीक आईये, फासले मिटाईये।

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खूबसूरत की गलियों में...


बाअदब बामुलाहिजा ये फरमा रहे हैं
तिरी दुनिया से रूखसत हुए जा रहे हैं।

जफा ही झेलने की आदत है मिरे दिल को
आप फालतू ही वफाएं किये जा रहे हैं।

हसीं खंजर से मरना भी कितना हसीं है
खूबसूरत की गलियों में आ जा रहे हैं।

कभी जश्ने-वफा में होश खोया किया
गमे-बेवफाई में आज पिये जा रहे हैं।

एक वक्त है जो जख्म भरने चला है
एक हम हैं जो उन्हें हरा किये जा रहे हैं।

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एक नाजनीं मेरे तसव्वुरात में...

ना जाने कौन सी बात का वहम धरती है
कि रोशनी मेरे दरीचे में आने से डरती है।

सबको पीछे छोड़ आने के बाद आजकल
जिंदगी खुद को तनहा महसूस करती है।

जिक्रे-मुहब्बत से ही आज परहेज है मगर
कुछ पुरानी गलतियां जरूर अखरती हैं।

तरक्कीपसंद शहर को अब याद नहीं शायद
एक गली तेरे घर के पीछे से भी गुजरती है।

सबब-ए-हादिसा-ए-कत्ले-खुद पर सोचता हूं तो
एक नाजनीं मेरे तसव्वुरात में उभरती है।
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